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परिवार समग्र संस्कारित जीवन की पाठशाला जबकि फैमेली एकल जीवन की सामाजिक त्रासदी,परिवार और फैमेली विषय पर रविवारीय प्रवचनमाला की शुरुआत

रतलाम 12 अगस्त(खबरबाबा.काम)।परिवार समग्र संस्कारित जीवन की पाठशाला है जबकि फैमेली एकल जीवन की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी. यही वजह है कि आज हर घर में परिवार और फैमेली के बीच बड़ा घमासान छिड़ा है. परस्पर स्नेह, सामंजस्य, सहयोग, सद्भभाव और सहिष्णुता के अभाव में परिवार बिखर कर फैमेली में तब्दील होते जा रहे है. इस विसंगति से समाज को बचाने के लिए परिवार को प्राथमिकता देने के संस्कार बहुत तेजी से देना होगा. धर्म जीवन में भी मोक्ष की भूमिका परिवार से ही प्रारम्भ होती है और सामाजिक जीवन का परिवार के बिना कोई आधार ही नहीं है.

 

जिनशासन रत्न श्री जिनचन्द्रसागरसूरिजी म.सा. एवं पू.आ. श्री हेमचंद्रसागरजी म.सा. ‘‘बंधु बेलड़ी’’ के इस आव्हान के साथ परिवार और फैमेली विषय पर रविवारीय प्रवचनमाला की शुरुआत हुई. श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ रतलाम द्वारा आगमोद्धारक वाटिका पर धर्म जागरण चातुर्मास के 22 वे दिन से प्रति रविवार यह विशेष प्रवचन रखे गए है. पहले रविवार को खचाखच भरे हाल में आचार्य श्री ने भारतीय संस्कृति द्वारा प्रेरित परिवार और पश्चिमी संस्कृति के बड़ी विकृति फैमेली का फर्क समझाया.

 

परिवार टूटने से फैमेली बनती है –

गुरु गुणानुवाद सभा में श्री हेमचन्द्रसागर जी मसा ने बताया भगवान ऋषभदेव ने भी समाज को परिवार का महत्व समझाने के लिए विवाह किया था. धर्मप्रिय बनने के पहले लोकप्रिय और उसके पहले परिवार प्रिय बनना आवश्यक है. जब तक परिवार के बीच में रहकर आपने स्नेह, सामंजस्य, सहयोग, सद्भभाव और सहिष्णुता के गुणों को आचरण में अंगीकार नहीं किया तो धर्म के मार्ग पर आप सफल नहीं हो सकते. किसी अंजान को अपनाकर उसे अपनत्व और आत्मीयता से अपना बनाने की प्रयोगशाला है परिवार. जब परिवार बिखरता है तो फैमेली बनती है. जिसमे भारत की भावी पीढ़ी को बचना बहुत जरूरी है. संस्कार, सदाचार, सौम्यता और सहिष्णुत का जंहा पोषण हो वो परिवार और इसके विपरीत जंहा हो वो फैमेली है. उन्होंने कहा की परिवार को जीवित रखना है तो फैमेली के नाम पर हो रहे बिखराव को रोकना होगा. संयुक्त परिवार में ही सेवा, अनुभव, सहयोग, सुरक्षा और परस्पर समर्पण के भाव के मजबूत होते है.आज समाज को फैमेली नहीं परिवार की जरूरत है.

 

परिवार गंगोत्री है  –

गणिवर्य श्री पदमचन्द्र सागरजी म.सा ने कहा परिवार से बड़ा कोई धन नहीं है. पिता से अनुशासन, भाई की सुख दुःख में भागीदारी, बहन से बड़ा कोई शुभ चिन्तक नही और माँ की गोद से बड़ी दुनिया का कोई आसरा नहीं होता है. यह सौभाग्य केवल परिवार वालों को मिलता है. परिवार वह गंगोत्री है जंहा से समग्र संस्कारित जीवन की गंगा निकलती है. परिवार वटवृक्ष है और फैमेली पीपल का वृक्ष. उन्होंने कहा कि फैमली में पिता की वसीयत और परिवार में नसीहत को प्राथमिकता दी जाती है. यह बहुत बड़ी भूल है कि माता पिता से अलग होकर कोई संतान हम दो और हमारे दो की फैमली में खुश रह सकता है. जिसके सिर पर माता पिता का साया नहीं भाई-बहन का प्यार नहीं उससे बड़ा अभागा कौन होगा? यह सुख केवल परिवार में है फैमेली में कंहा? समाज, राष्ट्र और मानव जाति का हित परिवार की विस्तृत विचारधारा में ही समाहित है. विशेष प्रवचन माला के प्रथम सौपन की लाभार्थी सुभद्रा मोहनलाल सोनी रही.