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प्रेम से ज्यादा भरोसा महत्वपूर्ण, लेकिन मोबाइल के युग में भरोसा टूट गया- पद्मभूषण रत्नसुंदरजी

रतलाम, 9 अप्रैल(खबरबाबा.काम)। संसार में प्रेम से ज्यादा भरोसा महत्वपूर्ण है। कई लोगों से प्रेम नहीं होता, लेकिन भरोसा होता है। विडंबना है कि आज मोबाइल के युग में भरोसा टूट रहा है। परिवार में बेटे, बहू, सास, ननद और पिता पर एक दूसरे को भरोसा नहीं होता, क्योंकि हमे सरल बनना था और हम कुटिल बन गए है।

राज प्रतिबोधक, पद्मभूषण, सरस्वतीलब्धप्रसाद, परम पूज्य आचार्य श्रीमद्विजय रत्नसुन्दर सूरीश्वरजी महाराज के इन उद्गारों के साथ मंगलवार को सैलाना वालो की हवेली, मोहन टॉकीज में 11 दिवसीय प्रवचनमाला प्रारंभ हो गई। पहले दिन आचार्यश्री ने क्या बनना था, और क्या बन गया? विषय पर प्रेरक मार्गदर्शन देते हुए कहा कि जीवन का चार पैमानों से मूल्याकंन करना चाहिए।  पहला वृक्ष बनना था और कृक्ष बन गए, दूसरा उपवन बनना था और वन गए, तीसरा नदी बनना था और तालाब बन गए तथा चौथा सूरज बनना था और जुगनु बन गए। अपने ह्दय में सभी झांके और देखे कि क्या बनना था और क्या बन गए। उन्होंने कहा कि वृक्ष,उपवन, नदी और सूरज सभी जगत के लिए उपलब्ध है। जबकि कृक्ष, वन, तालाब और जुगनु का स्थान सीमित होता है। वृक्ष की छाया सबकों मिलती है, वह कोमल होता है। उससे प्रेरणा लेकर हमे सबके प्रति कोमलता का व्यवहार करना चाहिए, लेकिन मनुष्य स्वहित में कठोर हो जाता है।

आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सोचना चाहिए कि उस पर लोगों का भरोसा कितना है। समाज, जीवन में दूसरों का प्रेम भले ही नहीं मिले, लेकिन भरोसा होना आवश्यक है। भरोसे के कारण ही व्यक्ति अनजान रिक्शा चालक और लिफ्ट में वाचमेन के साथ जाने मेें संकोच नहीं करते, वहां किसी का प्रेम नहीं होता है। भरोसे के लिए हमारा सरल होना जरूरी है, लेकिन हम कुटिल बनते जा रहे है।

आचार्यश्री ने कहा कि नदी बड़ी सरल होती है, उसका पानी  सबके लिए बहती है, जबकि तालाब का पानी पर एकाधिकार होता है। इनमें हमारी सोच कैसी है। हम सबके प्रति सोच रखते है कि हमारी सोच मेरा सिर्फ मेरे लिए वाली है। आचार्यश्री ने विभिन्न उदाहरण देकर जीवन को धन्य बनाने की प्रेरणा दी। इस दौरान बड़ी संख्या में धर्मानुरागी उपस्थित थे। संचालन मुकेश जैन ने किया।

प्रवेश जुलुस में जगह-जगह गहुली कर किया स्वागत

प्रवचनमाला से पूर्व राज प्रतिबोधक, पद्मभूषण, सरस्वतीलब्धप्रसाद, परम पूज्य आचार्य श्रीमद्विजय रत्नसुन्दर सूरीश्वरजी महाराज आदि ठाणा का रतलाम में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। श्री देवसुर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ, गुजराती उपाश्रय एवं श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर पेढ़ी रतलाम के तत्वावधान में मंगल प्रवेश का जुलुस निकला, जो मोतीपुज्यजी मन्दिर से प्रारंभ हुआ। प्रवेश जुलुस चांदनीचौक,तोपखाना,बजाजखाना,नौलाईपुरा,घांस बाजार होते हुए  सेठजी का बाजार स्थित आगमोधारक भवन उपाश्रय पहुंचा। मार्ग में गुरूभक्तों ने जगह-जगह जुलुस का स्वागत कर गहुली की । इस दौरान श्री संघ अध्यक्ष सुनील ललवानी, उपाध्यक्ष मुकेश जैन,सुनील मूणत, राजेश सुराना, अभय लुनिया, राजेंद्र खाबिया,  मोहनलाल कांसवा, विनोद मूणत एवं पियूष भटेवरा आदि उपस्थित थे।  10 अप्रैल को प्रवचनमाला में आचार्यश्री का विषय जीवन की सफलता क्या? सफलता कि प्रसन्नता? रहेगा।