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सुख भोगने के लिए भी पुण्य जरुरी है -प्रमाणसागरजी महाराज , लोकेन्द्र भवन में धर्मसभा में मुनिश्री ने जरुरत से ज्यादा आंकाक्षा को जीवन की दुर्बलता बताया

रतलाम,14अक्टूबर(खबरबाबा.काम)।संत शिरोमणी श्री विद्यासागरजी के परम शिष्य और शंका समाधान के निष्णात विद्वान मुनिश्री 108 प्रमाणसागरजी महाराज ने धर्मसभा में उद्गार प्रकट किए है किआज हर कोई लाभ और लोभ के चक्कर में पड़ा हुआ है ।इच्छा और आंकाक्षा को आकाश के समान अनंत माना जारहा है।लोगों   की  जिन्दगी  पूरी  हो  रही  है,  मगर  इच्छाएं  अधूरी रहती  है।आकांक्षा का कोई अंत नही है।इंसान की यह स्थितिउसकी दुर्बलता का कारण बनती है। इस स्थिति के बीच व्यक्तिसुख होते हुए भी उसे भोग नही पाता है, क्योकि कई तरह केपाप उसके सामने खड़े रहते है। ऐसे में सभी को आवश्यकतामूलक जीवन जीना चाहिए, आकांक्षा-मूलक जीवन शांति कोखंडित करता है। धर्म  के  मार्ग पर चलते रहिए, पुण्य से जुड़े  कार्यो को  अपनाए क्योकि  सुख भोगने के लिए पुण्य भी जरुरी है।

चातुर्मास धर्मप्रभावना समिति द्वारा लोकेन्द्र भवन मेंआयोजित चातुर्मास के दौरान धर्मसभा में मुनिश्रीप्रमाणसागरजी महाराज ने रविवार को गुरुभक्तों को आकांक्षा, दुराकांक्षा, अनाकांक्षा, निष्कांक्षा के सूत्र बताते हुए उद्गार प्रकटकिए है किआकांक्षा हर मनुष्य के मन मे है. मन मे पलने वालीआकांक्षा उसे व्याकुल बनाती है.  सच मानो तो मन आकांक्षासे रहित नहीं रहता. कई गुरुभक्त अलग अलग आकांक्षा लेकरमुनियो के पास जाते जो लेकिन उनके मन में केवल स्व औरपर के हित कि ही आकांक्षा रहती है. आकांक्षा पैदा हो औरपूर्ति ना हो तो मन दुखी रहता है। आज लोग पैसे की प्राप्ति केलिए और-और-और  की दौड़  लगा  रहे है। मगर इस पैसे का भोग नही कर पाते है। आलीशान बंगला है, नौकर चाकर है,  बढिया भोजन है,  गाड़ी घोड़े है, मगर इनको कमाने वाला सेठ बीमार है,  विभिन्न रोगों से घिरा पड़ा है।  जरुरत हो इतना संग्रह करो।बेवजह की भागदौड़ की बजाय खुद को स्वस्थ्य और निरोगीरखो, धर्म के मार्ग पर चलो, तप, तपस्या करो, आप निरोगीरहोगे और जीवन सफलता से कटने लगेगा।

   भोग- विलास वालो का जीवनखोखला

मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी ने उद्गार प्रकट किए है किआकांक्षा सामान्य है लेकिन जब यही इच्छाएं व्याकुल बनाएतो समझो गलत ट्रैक पर जा रहे हो. इंसान को खुद की स्थितिको पहचानना चाहिए कि वो कहां है?. आकांक्षा कोभोगाकांक्षा मत बनने दो, हिताकांक्षा बनाओ. आत्महित किआकांक्षा जागे तो भोगाकांक्षा कम होने लगती है. देखो क्यातुम्हारे अंदर भी पंचेन्द्रिय इंद्रियों के भोगो कि चाह बनी हुई है. मुनि श्री ने कहा की तडक- भडक, मौज- मस्ती, भोग- विलासवालो का जीवन खोखला. ऐसे लोगो का जीवन बैचेन रहता है. जैसे से ईधन से आग को बुझाना असंभव है वैसे ही भोग सेतृप्ति पाना असंभव है. भोग के प्रति उदासीन होना हीनिष्कांक्षा है. जो भोगजन्य सुख है वो कर्म के अधीन है. भोगाकांशा शांत दुख से मिश्रित पाप के बीज है ऐसे सुख केप्रति अंदर निष्कांक्षा होना ही उपादेय है.

मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी के पूछा की सुख कब भोगते हो? जब पुण्य का योग हो तब या फिर सुख कि सामग्री होतब. पुण्य का योग होने पर ही सुख भोगोगे ना की पुण्य कीसामग्री होने पर. सुख भोगने कि शक्ति सिर्फ पुण्यवान को है. भोग कि सारीसामग्री है लेकिन पुण्य नहीं है.  यही संयोग है. संयोग- पुण्य केयोग से मिलते है और संयोग के भोग भी पुण्य से मिलते है यहसब कर्म के अधीन है. ये नहीं खा सकते, वो नहीं खा सकतेसिफऱ् गम खा सकते हो. ऐसी हालत बना रखी है

हवा में उड़ान मत भरो, वो खिसक सकती है

मुनि श्री ने गुरुभक्तों को उद्गार प्रकट किए है कि  की हवा मे मत उडो, कब हवा बदल जाए, कब हवा खिसक जाए.

आकांक्षाओ कि ओट मे दुख है.  थोडा सुख है  तो साथ ही बहुत सारा दुख है. आकांक्षाओ कि आतुरता बनी हुई है, चीजेमिलने के बाद भोगने कि आकुलता, फिर अतृप्ति, फिर सोचतेहो नेक्ट और यही क्रम चलता रहता है. जुगाड़ मे मत लगे रहो. आत्म विश्लेषण करो, भोग कि पूर्ति मे जीवन बिताया यहखाज मिटी या बढी. ये खाज खुजाने से नही ज्ञान वैराग्य केमरहम से मिटेगी.मुनि श्री ने कहा की जीवन कि व्यवस्था को जिस दिन पराधीन मानोगे उस दिन से आकुल -व्याकुल नहीं होगे. सांसारिक सुखो को कर्म के अधीन मानो आकांक्षाए कमहोगी. असली कारण तो कर्म है. अत: पुण्य चाहिए तो सिर्फमन मे पुण्य कि चाह पैदा मत करो अच्छे कर्म करो।