रतलाम, 2 सितंबर (खबरबाबा.कॉम)। जिले में सीमांकन कार्यवाही को लेकर कलेक्टर अजय कटेसरिया ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। सीमांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता, एकरूपता और विधिसम्मत प्रक्रिया सुनिश्चित करने के साथ ही एक ही भूमि का बार-बार सीमांकन कर विवाद की स्थिति बनने से रोकने के लिए जिले के सभी अनुविभागीय अधिकारियों, तहसीलदारों, नायब तहसीलदारों, अधीक्षक भू-अभिलेख और राजस्व निरीक्षकों को निर्देशित किया गया है।
नए निर्देशों के अनुसार सीमांकन का आवेदन प्राप्त होते ही यह जांचना अनिवार्य होगा कि संबंधित भूमि या खसरा नंबर का पहले कभी सीमांकन हुआ है या नहीं।यदि पूर्व में सीमांकन हो चुका है तो पुराने प्रकरण का क्रमांक, दिनांक और उपलब्ध अन्य जानकारी दर्ज की जाएगी। आवेदक द्वारा जानकारी नहीं देने पर भी राजस्व अमला अपने दायित्व से मुक्त नहीं होगा। मौके पर सीमांकन से पहले पटवारी अथवा राजस्व निरीक्षक उपलब्ध राजस्व अभिलेखों से पूर्व सीमांकन की स्थिति की अनिवार्य रूप से जांच करेंगे।
यह करना होगा
कलेक्टर के निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि यदि भूमि का पूर्व में सीमांकन हो चुका है तो नए सीमांकन से पहले पुराने सीमांकन का प्रतिवेदन, नक्शा, फील्ड बुक, पंचनामा, सीमा चिन्ह और संबंधित आदेश उपलब्धता के अनुसार देखना अनिवार्य होगा।
यदि तहसीलदार द्वारा धारा 129(4) के तहत सुनवाई का अवसर देने के बाद पुराने सीमांकन की पुष्टि की जा चुकी है, तो केवल नया सामान्य सीमांकन आवेदन आने के आधार पर उसे दोबारा नहीं खोला जाएगा। ऐसी स्थिति में आवेदक को पूर्व सीमांकन की स्थिति से अवगत कराया जाएगा।
असंतुष्ट पक्षकार के लिए अपील की व्यवस्था
पूर्व में तहसीलदार द्वारा धारा 129(4) के तहत पुष्टि किए गए सीमांकन से कोई व्यक्ति असंतुष्ट है तो वह धारा 129(5) के तहत संबंधित अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष पुनः सीमांकन के लिए आवेदन कर सकता है।
आवेदन स्वीकार होने पर पक्षकारों और समीपस्थ भूमिधारकों को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा। जांच के बाद अनुविभागीय अधिकारी धारा 129(6) के अनुसार पुराने सीमांकन की पुष्टि कर सकते हैं अथवा नियमानुसार दल गठित कर पुनः सीमांकन कराने का आदेश दे सकते हैं। पुनः सीमांकन की कार्यवाही धारा 129(7) और निर्धारित सीमांकन नियमों के अनुसार होगी।
सीमा चिन्ह मौजूद हैं तो दोबारा सीमांकन नहीं
जहां अनुविभागीय अधिकारी के आदेश से पुनः सीमांकन कराया जा चुका है और सीमा चिन्ह स्थापित कर दिए गए हैं, वहां सामान्यतः तब तक दोबारा सीमांकन नहीं कराया जाएगा, जब तक स्थापित सीमा चिन्ह नष्ट न हो जाएं अथवा मरम्मत योग्य नहीं रह जाएं।
यदि सक्षम प्राधिकारी के आदेश से पुनः सीमांकन किया जाता है और नई सीमा पूर्व सीमांकन से अलग निकलती है तो प्रतिवेदन में पुरानी और नई सीमा की स्थिति के साथ अंतर का स्पष्ट तकनीकी अथवा अभिलेखीय कारण दर्ज करना होगा। बिना कारण बताए पूर्व स्थापित सीमा से अलग सीमा निर्धारित नहीं की जाएगी।
सीमांकन के तीन अलग-अलग मामलों को स्पष्ट किया
निर्देशों में सीमांकन की परिस्थितियों को तीन अलग-अलग श्रेणियों में रखते हुए नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
1. विक्रय या बंटवारे से नई भूमि की सीमा:
भूमि के विक्रय, बंटवारे या अभिलेखीय परिवर्तन के कारण नए भू-भाग की सीमा निर्धारित करनी हो तो नवीन एवं मूल अभिलेखों का समन्वय करते हुए वर्तमान अभिलेख के अनुसार सीमा चिन्हित की जाएगी।
2. सीमा चिन्ह नष्ट या मौके की स्थिति में बदलाव:
यदि पूर्व में स्थापित सीमा चिन्ह नष्ट, हटाए या परिवर्तित हो गए हैं अथवा मौके की स्थिति अभिलेख से अलग दिखाई देती है तो पुराने सीमांकन, नक्शा, फील्ड बुक और अन्य अभिलेखों की जांच कर नियमों के अनुसार सीमा पुनः स्थापित की जाएगी। जानबूझकर सीमा चिन्ह नष्ट करने या हटाने पर संबंधित प्रावधानों के तहत अलग से कार्रवाई भी की जाएगी।
3. भूमि और अभिलेख में कोई बदलाव नहीं:
यदि भूमि का पहले विधिवत सीमांकन हो चुका है और उसकी पुष्टि भी हो गई है तथा अभिलेख, भूमि के स्वरूप या सीमा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, तो सामान्य प्रक्रिया में बार-बार नया सीमांकन नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में पूर्व सीमांकन अभिलेखों का परीक्षण किया जाएगा और असंतुष्ट पक्षकार को धारा 129(5) से (7) के तहत उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।
सीमांकन से कब्जे और स्वामित्व का विवाद तय नहीं होगा
कलेक्टर ने स्पष्ट किया है कि सीमांकन का उद्देश्य राजस्व अभिलेखों के आधार पर संबंधित भूमि या खसरा नंबर की सीमा को चिन्हित अथवा स्थापित करना है। सीमांकन के दौरान कब्जे, स्वामित्व, अतिक्रमण या अन्य अधिकार को लेकर विवाद सामने आने पर उसका अंतिम निराकरण केवल सीमांकन के माध्यम से नहीं किया जाएगा।ऐसे मामलों में संबंधित पक्षकार सक्षम राजस्व न्यायालय, न्यायालय अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नियमानुसार कार्रवाई कर सकेंगे।
धारा 250 की कार्रवाई केवल पुनः सीमांकन के आवेदन से नहीं रुकेगी
निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सीमांकन के आधार पर धारा 250 की कार्रवाई लंबित होने पर केवल किसी पक्षकार द्वारा धारा 129 के तहत पुनः सीमांकन का आवेदन करने के कारण कार्रवाई स्थगित नहीं की जाएगी। धारा 250 की कार्यवाही तभी प्रभावित होगी, जब सक्षम न्यायालय अथवा प्राधिकारी द्वारा स्पष्ट स्थगन या अंतरिम आदेश जारी किया गया हो।
अब राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज होगा सीमांकन का इतिहास
बार-बार सीमांकन और विरोधाभासी रिपोर्ट की समस्या रोकने के लिए प्रत्येक पूर्ण सीमांकन के बाद संबंधित भूमि के राजस्व अभिलेख में सीमांकन प्रकरण क्रमांक, सीमांकन की तारीख और पुष्टि आदेश की तारीख का संक्षिप्त संदर्भ दर्ज किया जाएगा।
तहसील स्तर पर ग्रामवार सीमांकन की जानकारी भी संधारित की जाएगी। इससे भविष्य में नया आवेदन आने पर तत्काल पता लगाया जा सकेगा कि संबंधित भूमि का पहले सीमांकन हुआ है या नहीं।
सीमांकन की पूरी कार्यवाही रिकॉर्ड में सुरक्षित होगी
प्रत्येक सीमांकन के प्रकरण क्रमांक, दिनांक, सीमांकन प्रतिवेदन, नक्शा/स्केच, पंचनामा और स्थापित सीमा चिन्हों का विवरण नियमानुसार सुरक्षित रखा जाएगा। तकनीकी सुविधा उपलब्ध होने पर इन अभिलेखों को डिजिटल रूप में भी सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाएगी।
सीमांकन से पहले हितबद्ध पक्षकारों और समीपस्थ भूमिधारकों को नियमानुसार सूचना देना अनिवार्य होगा। मौके पर उपस्थित व्यक्तियों, उनकी आपत्तियों और उन पर लिए गए निर्णय को सीमांकन प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति पंचनामा पर हस्ताक्षर करने से इनकार करता है तो उसका नाम और हस्ताक्षर से इनकार करने का कारण भी अभिलेख में दर्ज किया जाएगा।कलेक्टर कटेसरिया ने अधिकारियों को निर्देशों का गंभीरता से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।