रतलाम,11अगस्त(खबरबाबा.काम)। मुनिश्री प्रमाणसागरजी ने आज धर्मसभा में कहा कि इंसान को हर दिन अपने जीवन की समीक्षा करना चाहिए। हर क्रिया को करने से पहले उसके परीणामों का मंथन करना चाहिए। भोग विलास, रंगरैलिया और नैतिकता को खंडित करने वाले कृत्यों को करने से पहले अपने गिराबा में झांकना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि ये सोचना चाहिए कि अपने हितों की पूर्ति से किसका और किस-किसका अहित हो सकता है।
खुद का ढंग देखों फिर दूसरों को सुधारों..
मुनिश्री ने प्रमाणसागरजी ने कहां कि आज लोग खुद तो सुधरते नही है और दूसरों से ढंग के व्यवहार, सदाचार और दयालुता की आशा रखते है। खुद अमर्यादित व्यवहार करते हुए और सामने वाले से सद्व्यवहार की अपेक्षा रखते है। दान भी देते है तो दिखावे का ढोंग करते है। बड़े पदों और औहदे पर बैठ जाते है मगर सोच बहुत छोटी ही रखते है। आज इंसान खुद की जिन्दगी को बेढंगी तरह से ढो रहा है और दूसरों को सुधारने की सीख दे रहा है। इसलिए पहले खुद सुधरने का प्रयास करो, धर्म और कर्म का पालन करो उसके बाद दूसरों से सुधरने का अनुरोध करो और उसे जिन्दगी के बदरंगों से दूर रहने की सलाह दो। मुनिश्री ने कहां कि ढंग से जीवन जीने के लिए मृद्वभाषी बनना जरुरी है। हमारा संभाषण मधुर होना चाहिए हमारे बात करने का तरीका, लहजा ऐसा हो कि आपकी बात से लोग आपके कायल हो जाए, घायल नही हो । अपने व्यवहार से हर आदमी का आदर करो। अगर आप बड़े आदमी हो तो आपसे मिलने आए छोटे आदमी को गले लगाओं ताकि वो छोटा आदमी भी आपकों हमेशा के लिए अपने मन में बैठा सके। मुनिश्री ने सफल जीवन के सूत्र बताते हुए अपने उद्गार में कहां कि आप हमेशा सरलता, सहेजता और शालीनता होना चाहिए। कुटिलता, दिखावा, प्रदर्शन और छल ज्यादा दिन के मेहमान नही रहते है। ऐसे में जीवन को गुजारों मगर ढंग से ढोंग से जिन्दगी विनाश का कारण बनती है।
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